10 जून 2011 - 19:30

सीरिया पर दबाव में वृद्धि के साथ ही मध्यपूर्व और उत्तरी अफ़्रीका के देशों को प्रभावित करने के संबन्ध में पश्चिम और रूस के बीच प्रतिस्पर्धा नए चरण में प्रविष्ट हो गई है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद में सीरिया के विरूद्ध प्रस्ताव पारित कराने हेतु ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी और पुर्तगाल जैसे योरोपीय देशों की और से मसौदा प्रस्तुत किये जाने का रूस ने कड़ा विरोध किया है। रूस के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोकांशविच ने कहा है कि उनका देश किसी एसे प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगा जो सीरिया के विरूद्ध हो। उन्होंने कहा कि सीरिया के आंतरिक परिवर्तन, अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा के लिए ख़तरा नहीं हंल और इस आधार पर इस विषय की सुरक्षा परिषद में समीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है।

सीरिया पर दबाव में वृद्धि के साथ ही मध्यपूर्व और उत्तरी अफ़्रीका के देशों को प्रभावित करने के संबन्ध में पश्चिम और रूस के बीच प्रतिस्पर्धा नए चरण में प्रविष्ट हो गई है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद में सीरिया के विरूद्ध प्रस्ताव पारित कराने हेतु ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी और पुर्तगाल जैसे योरोपीय देशों की और से मसौदा प्रस्तुत किये जाने का रूस ने कड़ा विरोध किया है। रूस के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोकांशविच ने कहा है कि उनका देश किसी एसे प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगा जो सीरिया के विरूद्ध हो। उन्होंने कहा कि सीरिया के आंतरिक परिवर्तन, अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा के लिए ख़तरा नहीं हंल और इस आधार पर इस विषय की सुरक्षा परिषद में समीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है। सुरक्षा परिषद के पश्चिमी सदस्य इस बात को लेकर चिन्तित हैं कि सुरक्षा परिषद के एक स्थाई सदस्य के रूप में रूस, सीरिया के विरूद्ध किसी भी प्रकार की अन्तर्राष्ट्रीय कार्यवाही के विरूद्ध कहीं वीटो का प्रयोग न करे। रूसी अधिकारियों ने सीरिया के संबन्ध में अभी वीटो के अधिकार के प्रयोग की बात तो नहीं कही है किंतु एसा प्रतीत होता है कि लीबिया के अनुभवों ने उसको मध्यपूर्व में नैटो के सैनिक हस्तक्षेप के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उपलब्ध समस्त संभावनाओं के प्रयोग के लिए दृढ संकल्पित कर दिया है। रूस के अनुसार शासकों के दमन के मुक़ाबले में विरोधियों के समर्थन को नैटो ने इस बात का बहाना बना लिया है कि वह विश्व के महत्वपूर्ण एवं स्ट्रैटेजिक क्षेत्रों में अपने सैनिक हस्तक्षेप करता रहे। इसके अतिरिक्त किसी देश में नैटो की सैनिक उपस्थिति इस बात की संभावना उपलब्ध कराती है कि मध्यपूर्व और उत्तरी अफ़्रीका में बाद में असितत्व में आने वाली शासन व्यवस्थाओं में वह अपनी सक्रिय भूमिका निभा सके। रूस इनमें से हर एक को अपने पश्चिमी प्रतिद्वदवियों के लिए एक विशिष्टता समझता है। रूसियों का यह प्रयास है कि वे मध्यपूर्व और उत्तरी अफ़्रीका में पश्चिम की सैनिक शाखा नैटो के प्रभाव और उसकी उपस्थिति को रोके और इस महत्वपूर्ण क्षेत्र को अपने पश्चिमी प्रतिद्वदवियों के एकाधिकार से सुरक्षित करे। अतः सुरक्षा परिषद में सीरिया के विरूद्ध प्रस्ताव का रूस द्वारा विरोध, इससे पहले की बश्शार असद के समर्थन में हो पश्चिम को नए मध्यपूर्व के गठन में विफल बनाने के प्रयास के अर्थ में है। रूस के पास सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव को वीटो करने का ही एकमात्र विकल्प नहीं है बल्कि रूसियों ने साथ ही साथ यह भी प्रयास किया है कि बश्शार असद की सरकार को सीरिया के भीतर सुधार कार्यक्रम के लिए प्रेरित करे। उनको इस बात की अपेक्षा है कि जबतक सीरिया में सरकार तथा विरोधियों के बीच दृष्टिगत सुधार नहीं हो जाते और राष्ट्रीय एकता नहीं बनती उस समय तक इस देश में पश्चिम के सैनिक हस्तक्षेप का बहाना बना रहेगा जो इस्राईल और फ़िलिस्तीन के इन परिवर्तनों के संबन्ध में केन्द्रीय भूमिका रखता है। सीरिया के संदर्भ में मास्कों की सकारात्मक नीति को कमज़ोर करने के लिए पश्चिम का हथकण्डा, बश्शार असद पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ाना रहा है। इस प्रकार ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने, जिन्होंने सुरक्षा परिषद में सीरिया के विरूद्ध मसौदा प्रस्तुत किया है, अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी आईएईए के बोर्ड आफ़ गवर्नर्स में भी सीरिया का परमाणु विषय प्रस्तुत किया है। हो सकता है कि सीरिया पर बढ़ता हुआ यही अन्तर्राष्ट्रीय दबाव, रूस को अपने वीटो का अधिकार प्रयोग करने हेतु बाध्य करे।